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Quotes in Sanskrit
1. “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” – स्वामी विवेकानन्दः
- अर्थ: उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक कि तुम अपने लक्ष्य (श्रेष्ठता) को प्राप्त न कर लो।
2. “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।” – स्वामी विवेकानन्दः
- अर्थ: यह आत्मा (या सर्वोच्च लक्ष्य) कमजोर, कायर या आत्मबल से हीन व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती।
3. “उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।” – पण्डित नारायणः
- अर्थ: कोई भी कार्य केवल इच्छा करने (सोचने) से पूरा नहीं होता, बल्कि कड़ी मेहनत और परिश्रम करने से ही सिद्ध होता है।
4. “वीरभोग्या वसुन्धरा।” – महर्षि वेदव्यासः
- अर्थ: यह पृथ्वी केवल उन्हीं लोगों के द्वारा भोगी (जीती) जाती है जो वीर, साहसी और पराक्रमी होते हैं।
5. “दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: भाग्य के भरोसे बैठना छोड़कर अपनी पूरी आत्मशक्ति और सामर्थ्य के साथ पुरुषार्थ (कठिन परिश्रम) करो।
6. “तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते।” – महाकवि कालिदासः
- अर्थ: जो लोग प्रतिभाशाली और तेजस्वी होते हैं, उनकी योग्यता देखते समय उनकी उम्र या आयु नहीं देखी जाती।
7. “क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।” – महाकवि भवभूतिः
- अर्थ: महान लोगों के कार्यों की सफलता उनके आंतरिक संकल्प और साहस पर निर्भर करती है, बाहरी साधनों या उपकरणों पर नहीं।
8. “न भेत्तव्यं न भेतव्यं विचार्यं तु पुनः पुनः।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: जीवन की चुनौतियों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि बार-बार ठंडे दिमाग से विचार करके सही मार्ग खोजना चाहिए।
9. “विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।” – पण्डित नारायणः
- अर्थ: सच्ची शिक्षा मनुष्य को विनम्रता देती है, और विनम्रता से व्यक्ति में योग्यता (पात्रता) आती है।
10. “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” – महर्षि वाल्मीकिः
- अर्थ: जन्म देने वाली माता और वह मातृभूमि जहां हमने जन्म लिया है, ये दोनों स्वर्ग से भी कहीं अधिक श्रेष्ठ और बढ़कर हैं।
11. “उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।” – महर्षि वेदव्यासः
- अर्थ: विशाल हृदय और उदार चरित्र वाले महापुरुषों के लिए यह पूरी धरती ही उनका अपना परिवार होती है।
12. “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।” – वैदिक ऋषयः
- अर्थ: पूरे ब्रह्मांड में चारों दिशाओं से कल्याणकारी, श्रेष्ठ और महान विचार हमारे भीतर प्रवेश करें।
13. “स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: एक राजा का सम्मान केवल उसके अपने देश (राज्य) में होता है, लेकिन एक विद्वान और ज्ञानी व्यक्ति की पूजा पूरी दुनिया में होती है।
14. “आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।” – महाराज भर्तृहरिः
- अर्थ: मनुष्य के शरीर में रहने वाला उसका सबसे बड़ा और घातक शत्रु कोई और नहीं, बल्कि उसका खुद का आलस्य है।
15. “नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।” – महाराज भर्तृहरिः
- अर्थ: परिश्रम (मेहनत) के समान मनुष्य का कोई दूसरा सच्चा मित्र नहीं है, क्योंकि मेहनत करने वाला कभी दुखी नहीं होता।
16. “संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैैरल्पकैरपि।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: छोटे या कम संख्या में होने पर भी अपनों के साथ मिलकर संगठन या एकता में रहना ही मनुष्यों के लिए सबसे कल्याणकारी होता है।
17. “क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च चिन्तयेत्।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: विद्यार्थी को समय के एक-एक क्षण का उपयोग ज्ञान पाने के लिए और एक-एक अन्न के कण का उपयोग संसाधन बचाने के लिए करना चाहिए।
18. “सत्यमेव जयते नानृतम्।” – वैदिक ऋषयः
- अर्थ: हमेशा सत्य की ही जीत होती है, झूठ या असत्य की कभी नहीं।
19. “तमसो मा ज्योतिर्गमय।” – महर्षि याज्ञवल्क्यः
- अर्थ: हे ईश्वर! मुझे अज्ञानता के अंधकार से बाहर निकालकर ज्ञान के दिव्य प्रकाश की ओर ले चलिए।
20. “योगः कर्मसु कौशलम्।” – भगवान श्रीकृष्णः
- अर्थ: अपने निर्धारित कर्तव्यों को पूरी कुशलता, एकाग्रता और निपुणता के साथ करना ही सच्चा योग है।
21. “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” – भगवान श्रीकृष्णः
- अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल की इच्छा या चिंता करने पर कभी नहीं।
22. “विद्वत्त्वं च नृपत्त्वं च नैव तुल्यं कदाचन।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: विद्वता (ज्ञान) और राजा की सत्ता की आपस में कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती।
23. “विद्या धनं सर्वधनप्रधानम्।” – महाराज भर्तृहरिः
- अर्थ: ज्ञान रूपी धन दुनिया के सभी प्रकार के धनों (सोना, चांदी, संपत्ति) में सबसे श्रेष्ठ और प्रधान है।
24. “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” – भगवान श्रीकृष्णः
- अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र, शुद्ध और कल्याणकारी दूसरी कोई वस्तु नहीं है।
25. “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।” – महाकवि कालिदासः
- अर्थ: किसी भी प्रकार के धर्म, कर्तव्य या अच्छे कार्य को पूरा करने का सबसे पहला साधन हमारा स्वस्थ शरीर ही है।
26. “गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्यो न सम्पदः।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: संसार में हमेशा मनुष्य के सद्गुणों की पूजा होती है, उसके ऊंचे पद या संचित संपत्ति की नहीं।
27. “शीलम् परम् भूषणम्।” – महाराज भर्तृहरिः
- अर्थ: अच्छा चरित्र और सदाचार ही मनुष्य का सबसे बड़ा और सच्चा आभूषण (गहना) होता है।
28. “सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।” – महर्षि मनुः
- अर्थ: सच बोलना चाहिए और प्रिय बोलना चाहिए, लेकिन ऐसा कड़वा सच भी नहीं बोलना चाहिए जो किसी को आघात पहुंचाए।
29. “परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।” – महर्षि वेदव्यासः
- अर्थ: वृक्ष स्वयं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की भलाई (परोपकार) के लिए फल देते हैं।
30. “परोपकाराय वहन्ति नद्यः।” – महर्षि वेदव्यासः
- अर्थ: नदियां अपना पानी खुद न पीकर दूसरों के कल्याण के लिए बहती हैं।
31. “परोपकाराय दुहन्ति गावः।” – महर्षि वेदव्यासः
- अर्थ: गायें दूसरों को पोषण देने और परोपकार के लिए ही दूध देती हैं।
32. “परोपकारार्थमिदं शरीरम्।” – महर्षि वेदव्यासः
- अर्थ: हमारा यह मानव शरीर भी दूसरों की सेवा, सहायता और परोपकार करने के लिए ही मिला है।
33. “अति सर्वत्र वर्जयेत्।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: किसी भी चीज की अति (ज्यादा होना), चाहे वह अच्छी हो या बुरी, हमेशा नुकसानदेह होती है और उसका त्याग करना चाहिए।
34. “लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रजायते।” – पण्डित नारायणः
- अर्थ: अत्यधिक लालच करने से ही क्रोध का जन्म होता है और लालच से ही गलत इच्छाएं पैदा होती हैं।
35. “मनसि एकं वचसि एकं कर्मणि एकं महात्मनाम्।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: महान लोगों के मन में जो होता है, वही उनकी वाणी पर होता है और वही वे अपने कर्म में भी करते हैं (वे कथनी-करनी में एक होते हैं)।
36. “मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: दुष्ट लोगों के मन में कुछ और होता है, वे बोलते कुछ और हैं और पीठ पीछे करते कुछ और ही हैं।
37. “बुद्धिः यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: जिसके पास बुद्धि और विवेक है, वास्तव में असली बल उसी के पास है; बुद्धिहीन व्यक्ति के पास शारीरिक शक्ति होने पर भी वह बलवान नहीं कहलाता।
38. “परदुःखं भावयत एव निजदुःखं शाम्यति।” – महाकवि बाणभट्टः
- अर्थ: जब व्यक्ति दूसरों के बड़े दुखों को देखता और समझता है, तब उसके अपने व्यक्तिगत दुख अपने आप शांत और छोटे हो जाते हैं।
39. “मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: मूर्ख व्यक्ति के मुख्य पांच लक्षण होते हैं—अहंकार करना, कड़वे या बुरे वचन बोलना, जिद्दी होना, दूसरों का अनादर करना और बिना सोचे काम करना।
40. “काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।” – संस्कृत सुभाषितकारः
- अर्थ: एक अच्छे विद्यार्थी में कौवे जैसी जानने की चेष्टा (प्रयास), बगुले जैसा ध्यान (एकाग्रता) और कुत्ते जैसी सतर्क नींद होनी चाहिए।
41. “अल्पहारि गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणम्।” – संस्कृत सुभाषितकारः
- अर्थ: कम (आवश्यकतानुसार) खाने वाला और सुख-सुविधाओं के मोह से दूर रहने वाला ही सच्चे अर्थों में विद्यार्थी कहलाता है।
42. “यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: जैसा मनुष्य का विचार या मन होता है, वैसी ही उसकी भाषा होती है; और जैसी भाषा होती है, वैसे ही उसके कार्य होते हैं।
43. “चित्ते वाचि क्रियायां च साधूनामेकरूपता।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: सज्जन लोगों के विचारों, शब्दों और कार्यों में हमेशा पूर्ण रूप से समानता (एकरूपता) दिखाई देती है।
44. “ज्ञानं भारः क्रियां विना।” – पण्डित नारायणः
- अर्थ: यदि प्राप्त किए गए ज्ञान को आचरण या व्यवहार में न लाया जाए, तो वह ज्ञान मस्तिष्क पर केवल एक बोझ के समान बन जाता है।
45. “न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति।” – पण्डित नारायणः
- अर्थ: बिना जोखिम उठाए या कठिनाइयों का सामना किए बिना कोई भी मनुष्य जीवन में महान सफलता और कल्याण को प्राप्त नहीं कर सकता।
46. “संसारकटुवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले।” – महाराज भर्तृहरिः
- अर्थ: इस संसार रूपी कड़वे पेड़ में केवल दो ही अमृत जैसे मीठे फल हैं—सुंदर ज्ञानयुक्त काव्य का आनंद लेना और सज्जन लोगों की संगति करना।
47. “काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: बुद्धिमान और ज्ञानी लोगों का समय अच्छी पुस्तकों को पढ़ने, ज्ञान की चर्चा करने और रचनात्मक कार्यों में बीतता है।
48. “व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।” – पण्डित विष्णु शर्मा
- अर्थ: मूर्ख लोगों का समय बुरी आदतों (व्यसनों) में, जरूरत से ज्यादा सोने में या दूसरों के साथ लड़ाई-झगड़ा करने में नष्ट होता है।
49. “दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यया अलंकृतोऽपि सन्।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: यदि कोई दुष्ट या बुरे स्वभाव वाला व्यक्ति बहुत पढ़ा-लिखा भी हो, तो भी उसकी संगति का तुरंत त्याग कर देना चाहिए।
50. “मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: जिस प्रकार माथे पर चमकीली मणि होने के बाद भी सांप जहरीला और खतरनाक ही रहता है, वैसे ही विद्या पाकर भी दुष्ट व्यक्ति खतरनाक ही रहता है।
51. “सेवा धर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः।” – महाराज भर्तृहरिः
- अर्थ: निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करने का जो धर्म है, वह अत्यंत कठिन और गहरा है; इसे समझना बड़े-बड़े योगियों के लिए भी कठिन होता है।
52. “सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: सुख चाहने वाले (आलसी) को विद्या कहां मिल सकती है, और विद्या चाहने वाले (विद्यार्थी) को शारीरिक सुख-सुविधाएं कहां मिल सकती हैं।
53. “सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।” – आचार्य चाणक्यः
- अर्थ: इसलिए, यदि आराम और सुख चाहिए तो पढ़ाई की उम्मीद छोड़ दो, और यदि ज्ञान पाना है तो सुख-सुविधाओं और आलस्य का त्याग कर दो।